धधक रहा रक्त शिराओ का
नयन क्रोध से अश्रुपूरित हुए।
भावना में आक्रोश से तरुण के
संकल्प बीज तन में अंकुरित हुए।

भौहे तन के त्रिशूल सम हुई
रौद्र रूप शिव का जाग उठा
मन में ज्वाला स्फुटित हो गयी
अब शांति अहिंसा से मोह टूटा।

व्यथा के सागर का ज्वार उठा
टूटा करुणा का बंधा बांध अब
आशा मैत्री संबंध की टूट गयी
बस चीत्कार सुन रहा नग्न नभ।

नित नव सिपाही शान्ति काल में
स्व देह इस देश को दे जाते है।
घर उजड़ता है किसी मां बहन का
हम केवल निंदा कर रह जाते है।

सीमा निर्धारित नहीं हुई दोनों की,
सत्तर वर्ष से यह दुखदायी है।
अब विचारने का वक्त आया
कौन इस हेतु उत्तरदायी है।

देश के जवाहर की विदेश नीति
जग में प्रशंसा का पात्र बनी है।
फिर क्यों पड़ोसी राष्ट्रों की चालें
हमारी चिंता का पात्र बनी है।

पंचशील से भी तनिक शील नहीं,
आज भी डोकलाम पर अड़ जाते है।
संग झूला झूल बहलाने के बाद भी
वे मसूद के लिए अड़ जाते है।

बस शहीदों की कामना तृप्त हो,
बदला जन जन में संकल्पित हो,
हमारी मां भारती का जयघोष हो,
बैरी लहू से आत्मा को संतोष हो।