मेरी चिताणी बुक पर मेरे विचार



चिताणी जो लेखक की रग-रग में बसी हुई है, उससे व ग्रामीण परिवेश को यह किताब बखूबी बयां करती हैं! साथ ही यह एक सामान्य परिवार व 50-60 दशक के बच्चे के पढ़ने की लालसा ओर उसके फर्श से अर्श तक का सफर भी दिखाती हैं।

लेखक अपनी मातृभूमि व स्थानीय भाषा के शब्दों, संस्कृति व यहां की प्रतिकूल मौसमी परिस्थितियों जैसे - अकाल इत्यादि के समय मे लोगों के जीवन विचरण व उनके हालात को बड़ी सरलता के साथ रखते हैं।

किताब पढ़कर ऐसा लगता हैं कि लेखक अपने माता पिता से निसंकोच बातें किया करते थे! जो जरूरी भी होता हैं। लेखक ने हर एक विषय को काफी खुलकर बयां किया है, यहां तक कि उन्होंने अपनी माता के सम्बंध में लोगों की एक नवविवाहित स्त्री के प्रति ओछी मानसिकता को भी प्रमुखता के साथ रखा हैं।

लेखक ने बारीकियों के साथ हर एक पहलू को इसमें रखा है, चाहें वो लोगों द्वारा बुद्धि का परीक्षण हो या नोकरी लगने पर करीबियों व अन्य जानकार लोगों के हाव-भाव या उनके द्वारा पिता को गरीब व छोटा बताना या फिर टोंड कसते हुए कहना कि 'तेरे ठाट हैं' हालांकि इन्हीं बातों के मध्य एक कसक महसूस होती हैं कि लेखक ने अपने ऊपर बीते दुःख दर्द को प्रमुखता से क्यों नहीं रखा? परन्तु ज्यादा सोचने पर लगता है कि उन्होंने शायद पाठक को भावुकता की आंधी से दूर रखने हेतु ऐसा किया होगा!

कई जगह ऐसा भी महसूस होता है कि लेखक ने अपनी जाति को कई जगह दोहराकर उसको एक निश्चित मुकाम देने की कोशिश की हैं।

एक प्रसंग ऐसा भी आता है जब लेखक ने सामाजिक परिवर्तन व मुद्दों को भी हल्के शब्दों परन्तु ठोस अन्दाज से उठाने का प्रयत्न किया है जैसे - पानी, प्राचीन संस्कृति, धरोहरों यथा नाडी, तालाब, बावड़ियों का विलुप्त होना या उन्हें उपेक्षा की ओर धकेलना!

"चिताणी शहर में" से आगे पुस्तक सच कहूं तो थोड़ी रोचक कम हो जाती हैं... मैं यहां झूठ बोल कर लेखक को खुश नहीं करना चाहता 'ओर न हां कहता ओर न ना कहता' इस अरुचि के बारे में तो मैं अपनी राय के साथ धोखा करता!
इस मामूली सी अरुचि का कारण है हर टॉपिक के नम्बर के साथ बदलता उसका लेखन विषय.... हालांकि नया वाला टॉपिक भी पाठक को बांधे रखने में कामयाब हो जाता है परंतु बार-बार नए मुकाम पर पहुंचना भी अरुचि का कारण पैदा करता है!

कई पंक्तियां ऐसी भी आती हैं जो आपके मन मस्तिष्क में घर कर जाती हैं जैसे वो 'आज भाटो घालियों है, काले आटो घाली' यह लाइन्स जीवन में निरंतर प्रयास करने की प्रेरणा देती हैं, साथ ही हार से हताश नही होने का सबक भी सिखलाती हैं।

पन्ने दर पन्ने आगे बढ़ने पर कुछ जगहों पर लेखक ने अफसरशाही या उच्चाधिकारी के अनेतिक कार्यों व भेदभाव की ओर भी ध्यानाकर्षण करने की सफल कोशिश की है ओर नवागंतुक सरकारी कर्मचारियों को सचेत भी किया हैं।

"चिताणी अमेरिका में" चिताणी पर अमेरिका की आबोहवा हावी रही है ऐसा महसूस होता है! लेखक उसके सौन्दर्य, आधुनिकीकरण में गहराई में समा गया! ओर अमेरिका से भारतदेश की तुलना करने लगता हैं, यहां ऐसा प्रतीत होता है कि वो अमेरिका से भारत की तुलना करके शायद यहां के सिस्टम की नाकामी बताना चाह रहें हो!

कुछ घटनाक्रम ऐसे भी आते हैं जब लेखक ने उदाहरण देकर या लोककथाओं के माध्यम से स्त्री को सशक्त प्रस्तुत करने का प्रयास किया है, चाहें वो राजा का मन बहु पर आ गया वाली कथा हो या फिर नर्तकी राय प्रवीन वाला किस्सा - ये बातें/कहानियां एक स्त्री के मजबूत इरादों की ओर ध्यान अंगित करती हैं ओर वर्तमान आबोहवा में लड़कियों/महिलाओं को किसी भी अनुचित घटना का डटकर मुकाबला करने की सीख देती हैं।

आखिर में यही कहूंगा कि "मेरी चिताणी" पुस्तक पढ़कर मन में एक अलग ही ख़ुशी महसूस हुई ओर लेखक के संग एक अनिश्चिकालीन भ्रमण करके अपने ज्ञान कक्ष को दीर्घ करने का लुफ्त उठाकर आनंद से परिपूर्ण हुआ, वैसे हिंदी का कम जानकार हूं इसलिए शब्दों में कोई त्रुटि हो या कोई अनर्गल अर्थ निकलता हो तो क्षमा करें💕

- संजय ग्वाला

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