थोड़े कठिन हालात हैं, किस्मत का रोना रो रहा हूं
सारा दोष खुद को देकर, गहरी नींद सो रहा हूं
चाहता हूं जीना, खिलखिलाकर हंस-हंसकर
रोड़े यह आ रही है किस्मत, बनके तस्कर
मैं तो हूं नादां, क्यों यह मेरे पीछे पड़ी है
बनकर मेरी जीवनसंगिनी, सामने ही खड़ी है
क्या चाहती है यह, मुझ छोटे बंदे से भीड़कर
मैं तो पीछा छुड़ाना चाहता हूं इससे, लड़-झगड़कर
ना मैंने ज्यादा मांगा है, ना इसने दिया है
करके गुजारा, अपना जीवन गुट-गुटकर जिया हैं
फिर क्या है इसके फ़साने, क्या है शिकवे गिले
क्यों सामने आकर, हर रोज यह मुझसे मिले
हूं अकेला तो क्या ग़म हैं(2)
बिक रहा मुफ़लिसी के बाज़ार में, यह क्या कम है
डर नहीं है जिगर में(2) भले ही यह मुझे रौंदे
यह दुनिया सावन बनकर चाहें अपनी आंखें मूंदे
तू दूऊऊऊर से कितना ही मुझे तांके
मेरा दिल कहता है, तेरा मन मेरी ओर ही झांके
मैं तो किस्मत ओर कर्म का रोना रोकर भी, लिख जाऊंगा
तुम मुझे मारने आओगे, मैं कलम की स्याही बनकर उड़ जाऊंगा।
तरस जाओंगे एक दिन, इस दीन-ए-दुखि के चेहरे को
मैं बहुत फासले से मुस्कुराहूंगा, देख-के तुम्हारी आंखों के नीर को
थोड़े कठिन हालात हैं, किस्मत का रोना रो रहा हूं।
सारा दोष खुद को देकर, गहरी नींद सो रहा हूं।।
©संजय ग्वाला


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