जिंदगी... कलेक्टर सी हो चली है! जो हर वक़्त अकड़ दिखा रही है ओर मुझे पैरों तले कुचलने में लगी हुई हैं, परन्तु मैं भी उसे किसी जन्मजात राजनेता की भांति सबक सिखाने पर तूला हुआ हूं।
अब क्या बताऊँ आपको इसके बारे में! मैं स्वयं इसके चूतियापे से हैरान-परेशान हूं। यह हर वक़्त मेरा कुछ न कुछ काट रही हैं, इतना तो गरलफिरेनड भी नहीं काटती! अब तो डर रहने लगा है कि कही यह जरूरी सामान पर हाथ ना साफ कर दे। रब बचाये इससे!
हालात यह हो चुके हैं कि मेरे काम का कुछ मुझे दिखता है या लगता है तो वो मुझसे छिन जाता है, जहाँ रिक्त स्थान होता है वहां मेरी दिव्य दृष्टि पड़ते ही फुल/कोई जगह नही का बोर्ड लग जाता है।
ओर तो ओर अगर मुझसे कोई दोस्त मदद मांगता है तो मैं बेझिझक मदद करता हूं!(जितनी मुझसे हो सकती हैं) खुश होकर आगे वाला भी कहता है... "मुझे कभी संकट में याद कर लेना वापस" मैं जब उनको याद करता हूं तो उनके काम आ जाता है, कभी-कभी वो बहुत व्यस्त हो जाते हैं, जैसे कि कलेक्टर हो? कई बार वो परदेस में बितयाते है।
जिंदगी के दर्द ए सितम ऐसे हो गए हैं, जैसे कि अचानक से गाय के मोतिन्द फूट पड़ने लगता है ओर डॉक्टर भी उस क्षण नही मिल पाता! अब बछड़े का हाल यह है कि उसका सिर अंदर है, हाथ पैर चार आंगल बाहर दिख रहे हैं... बहुत कठिन दौर होता है यह! हालात पर रोने का मन करता है पर वो भी नही कर सकते! उनको भूलने का दिल करता है पर यह भी मुश्किल सा प्रतीत होता है क्योंकि सब ऐसे ही मिलेंगे।
ऐसे समय में 'ओखली में सर होना' वाली पंक्तियाँ ही फिट बेठती हैं ओर छद्म रूप से चाहने वाले कूटते रहते हैं... जब एक-दो मार पड़ती हैं तो लता जी वाला गाना "तुझसे नाराज नही जिंदगी हैरान हूं मैं" दिलोदिमाग में गूंजता हैं!
©संजय ग्वाला


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