देखों सूरज डूब रहा है!
आओ मिलकर हम एक लौ जलाते हैं।
अंधयारे के इस मौहाल में,
एक नई किरण दिखाते हैं।
भटक रहे हैं लोग यहां पे,
दर-दर की ठोकरे खाते हैं।
देखों सूरज डूब रहा है!
आओ मिलकर हम एक लौ जलाते हैं।
तन्हाइयों की इन बड़ियों को,
हम साथ मिलकर तोड़ डालते हैं।
गठजोड़ करके एक नया रूप लेते हैं,
आओ मिलकर हम एक लौ जलाते हैं।
फैल रही है बुराइयां, नित नई रोज हैं,
खाकर अपना अधिकार, वो कर रहे मौज हैं।
देखों सूरज डूब रहा है!
आओ मिलकर हम एक लौ जलाते हैं।
गरीबी का आलम हर जगह झलक रहा है,
किसान सरकारों की ओर तलक रहा हैं।
वो वादों का अंबार लगा गए,
पूछा जो हमनें तो जंजाड़ गये।
हम नादां उनकी ओर देख रह जाते हैं,
वो हर बार मीठा चुना लगा चले जाते हैं।
अब क्रांति का आगाज हम करते हैं,
समाज में फैली गंदगी को दूर भागते हैं।
देखों सूरज डूब रहा है!
आओ मिलकर हम एक लौ जलाते हैं।


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