पूरे 5 साल बाद गांवों में अब फॉग और सर्दी के अलावा सरपंच वाले चुनाव भी चल रहे है।देश यूनिवर्सिटीयों में लगाई गई आग में जल रहा है,कई लोगों की आग में अपनी बाटियां सिक रही रही है,तो कइयों की आत्मा दुखी हो रही है।गांव में भी आग जल रही है,पर यहां आग सर्दी को भगाने के लिए और चर्चा करने के लिए है सरपंचाई पर।

सभी इसी पर बात कर रहे है,रात को अलाव के पास बैठे बैठे जो समीकरण सब बना रहे है,मैं सोचता हूँ कि TV वाले विशेषज्ञ इन्हें सुन ले तो भगवा पहनकर हिमालय निकल ले,और जल समाधि ले ले।

प्याज कचौरी की जगह मोगर कचौरी खिलवाकर निर्मल बाबा जैसे किसी को सफल बनाते है ठीक वैसे ही अलाव में हाथ तपाकर सब अपने दिमाग और पूर्वाग्रहों से अमुक आदमी सरपंच बनवा देते है।हुआ यूं कि एक बार एक छोटा सा लड़का हमको कहता है कि देख ये बातें तो ऐसी कर रहे है जैसे सरपंच बनाना इन्हीं के हाथ में हो..मैंने कहा कि हम नाई से बाल कटवाते कटवाते अमेरिका का राष्ट्रपति तय करते है,महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री निर्वाचित करते है और फिर इसमें तो गांव की बात है।

दरअसल हम भारतीय पैदाइशी ज्ञानी होते है,हां इतना है कि बांटते तभी है जब सामने वाला हमसे कम ज्ञानी हो,क्योंकि फालूदा आइस क्रीम का अच्छा लगता है इज्जत का नहीं।
आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि सरपंच मुँह और बाकी सब धोकर नहीं बना जाता,यह बड़ा चुनौतीपूर्ण काम है।आदमी को तन मन और सबसे जरूरी चीज धन देना पड़ता है।अनुष्का शर्मा के जैसे 'दिल पर पत्थर रखकर' पैसे उड़ाने पड़ते है।स्कूल में अमीर बच्चे बर्थडे के दिन चॉकलेट बांटते है उसी तरह पैसे बांटने पड़ते है।

दूसरी चीज कि आदमी ने शर्म और री'स(क्रोध) हूं बराबर 1 कोस आंत'रे रहणो,ऐ दोन्यूं नेड़ी री ना तो वोट कोनी मिलेला,याद राखिज्यों।

तीसरो हा सा और जी तो गांव के गण्डक के लारे ही लगाणों पड़लो।
बोलने में आपको इतना समझदार होना चाहिए कि आप किसी से बोलो,बात करो तो बात करने के बाद आदमी कभी दर्पण देखें तो देखते समय आदमी को लगना चाहिए कि इज्जतदार आदमी का चेहरा ऐसा होता है।

अगर उसको ऐसा न लगे तो तो आपको आत्म सुधार की बहुत आवश्यकता है।
आपको ध्यान है कि सरपंच के हाथ में इतना नहीं होता फिर भी घोषणा पत्र में कहो कि महंगाई कम करवा देंगे,CAA NRC का विरोध करेंगे,टोल नाके बन्द करवा देंगे,देश को नई राह दिखाएंगे और हां भाषण में वजन कम लगे तो भारत को विश्व गुरु बनाने की बात भी कह सकते है।

सबसे जरूरी फेसबुक पर स्टेटस रोज़ स्टेटस लगाना,इससे आपको फायदा ये होगा कि फ्रेंड रिक्वेस्ट आनी शुरू हो जाएगी,लाइक्स बढ़ जाएंगे,सबसे जरूरी की कमेंट में आपको सरपंच सा'ब लिखने लगेंगे,शर्म साइड में रखकर आप इस शब्द और उपाधि का आनंद ले सकते है।

अब पोस्टर भी छपवाने पड़ेंगे,सोशल मीडिया या बाहर स्कूल वाले पोस्टरों के ऊपर आपकी फ़ोटो लगेगी,पोस्टर छपवाते समय ध्यान रखिये कुछ बातों का...

पहली,वोट भले आपको आपके घर वाले ना दे,पर वोट देने की अपील का निवेदन समस्त ग्रामवासी की तरफ से होना चाहिए।ऊपर हैडिंग में गूगल से कॉपी- पेस्ट करके शायरी न चिपकायी तो भविष्य अंधकार में होगा आपका।

भले ही आप सात दिन न नहाये पर पोस्टर में कर्मठ,साफ सुथरा लिखा होना चाहिए।
आप दूसरों के खेत के धोरों को तोड़कर अपने खेत में मिलाते हो,गली में नालियों को लेकर लड़ाई करते हो पर पोस्टर में स्वच्छ छवि लिखो।

हो सकता है कि सच से आपका रिश्ता नहीं हो और यह शब्द भी पुरानी फिल्मों में मिथुन के मुँह से सुना हो पर पोस्टर में 'ईमानदार' नाम लिखवाइये।तब जाकर आप परिपक्व उम्मीदवार नजर आयेंगे।

ये दिशा निर्देश थे,जिन्हें ध्यान में रखकर मार्केटिंग करनी चाहिये।

जनता को पांच सालों में गांवों की सरकार चुननी होती है,अतएव जो भी उम्मीदवार आये उसको यही कहे कि आपको ही वोट देंगे,इससे होगा कुछ नहीं,बस उसको अच्छा लगेगा।दूसरे तीसरे उम्मीदवार को भी यही बात कहे, इससे उनका कॉन्फिडेंस तगड़ा हो जाता है।सच बोलकर हमें "अखिल भारतीय राजा हरिश्चंद्र स्मृति सम्मान" तो मिलने से रहा।इसलिए हां सबको दो...

आप आप बेरोजगार हो या अभी कोई काम न हो,तो उनके टेंट में जाकर चाय नाश्ते के आनंद ले सकते है,साथ में बिना नेशनल TV के आप विशेषज्ञों से शुद्ध मारवाड़ी में वर्तमान परिदृश्य से सम्बंधित गुरुज्ञान अर्जित कर सकते है यद्यपि इनमें सत्यांश अल्प मात्रा में होगा तथापि ज्ञान ज्ञान होता है।

और कहा भी जाता है कि "ज्ञान और घोचो दूसरां के ही राखणो"।
और एक महत्वपूर्ण बात हो सकता है की आपके घर अब लोग आए जिन्हें आप नहीं जानते हो तो कोई "वयस्क अविवाहित एवं आतुर युवक" यह न सोचें कि हमें देखने के लिए आये है,हो सकता है कि वोट मांगने आये हो(मैंने 'हो सकता है' कहा है)।

अंत में यही कहूंगा कि लोकतंत्र के पर्व देश को जोड़ने वाले होते है,विकास और सद्गति देने वाले होते है,इसलिए अपनी जाति या धर्म या कोई परिवार वालों को ही जिताएं क्योंकि तभी हमारा विकास होगा। हर एक आदमी 1 बट्टा 130 करोड़ हिंदुस्तानी है,खुद की जेब भरेंगे तभी देश का खजाना भरा जाएगा और खजाना कितना भी भरे मुख्यमंत्री जी के लिए तो खजाना खाली ही रहेगा,इसलिए उम्मीदवारों से कहूंगा कि जनता के खूब पैसे खाएं,आप इनके प्रतिनिधि है तो आपका दायित्व बनता है कि जनता के पैसों से आप स्वयं का विकास करे क्योंकि जो खुद का विकास न कर सका,जनता का खाक करेगा।(वैसे मुझे पता है कि आप इतने समझदार हो कि ऊपर वाली बात कहने की जरूरत नहीं थी,पर फिर भी कोई दायित्व भूल जाये तो हम जैसे कवियों का दायित्व बनता है कि याद दिलाये)।

बाकी शुभकामनाएं....
आपका शुभहितैषी,

Disclaimer:-पूरे विचार मेरे खुद के है और पूरा लेख व्यंग्य की दृष्टि से लिखा गया है,एक भी बात की गंभीरता से न लें और खुद पर न लें। फिर भी अगर किसी को कोई आपत्ति हो तो बात कर सकते है....
राम राम

©रामनिवास भांबू