लिख रहा हूं इतिहास वीर का...



लिख रहा हूं इतिहास वीर का...
जिसने तन-मन से भोपालगढ़ को सींचा था।
कर मेहनत हर घड़ी, इस नगरी का रुतबा गाड़ा था।
थे साहब हमारे ऐसे, के हर कोई बराबरी में चलता था।
जज नही थे, जज नही थे, पर रगों में न्याय पलता था।।

लिख रहा हूं इतिहास वीर का...

सतयुग की बातें ओर थीं, यहां कलजुग में लक्ष्मण आया था।
निभा राम सा साथ सबका, सुख में भी ना सोया था।
मिटा अंधेरे को, दीप सा जलता था।
थे साहब हमारे ऐसे, के हर कोई बराबरी में चलता था।।

लिख रहा हूं इतिहास वीर का...

आहट सुनकर अफसर दौड़ा करते थे।
बिन रिश्वत, बिन लफड़ों के काम हुए करते थे।
भाईचारा कैसे रखें सबमें, इसकी मिसाल हुआ करते थे।
थे साहब हमारे ऐसे, के हर कोई बराबरी में चला करते थे।।

लिख रहा हूं इतिहास वीर का...

किसान थे, किसानों के साथ खड़े थे।
निभा अपना फर्ज, हर मुश्किल में दौड़ पड़ा करते थे।
करते थे कुछ लोग षड्यंत्र, पर वो ना कभी झुके थे।
थे साहब हमारे ऐसे, के हर कोई बराबरी में चला करते थे।।

लिख रहा हूं इतिहास वीर का...

कौरवों की सेना के आगे, वो अर्जुन से भिड़े रहते थे।
भोपालगढ़ में हर मौन की आवाज, वो हुआ करते थे।
थाम लेते हाथ जिसका, हर मंजिल पार करवाते थे।
थे साहब हमारे ऐसे, के हर कोई बराबरी में चला करते थे।।

लिख रहा हूं इतिहास वीर का...

शहरों की तूती जब बोला करती थी।
गांवों की जब आवाज दबा दी जाती थी।
तब ले आये वो शिक्षा का आंगन।
हां गाढ़ी थी नींव साहब ने, अब जहां तुम कूदा करते हो।
दो फुट के पत्थर की मुरत, उनके आगे छोटी थी।

लिख रहा हूं इतिहास वीर का...

नए नवेला रूप है तेरा, जो जाति पे इतराता हैं।
36 क़ौम साथ था उनके, भेद नहीं करते थे।
थे साहब हमारे ऐसे, के हर कोई बराबरी में चला करते थे।।

लिख रहा हूं इतिहास वीर का...
जिसने तन-मन से भोपालगढ़ को सींचा था।।

©संजय ग्वाला

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