कहने को तो... मैं चाहता हूं, आप चाहते हैं और अपने असावरी गांव का शायद प्रत्येक परिवार व सदस्य चाहते हैं कि वर्षों पुराना और अपने समय का सर्वश्रेष्ठ सरकारी विद्यालय पुनः अपने उच्चतम आयामों को हासिल करें जिससे यहां के हर तबके के बच्चों को निःशुल्क अच्छी गुणवत्ता की शिक्षा मिल सके और प्राइवेट स्कूलों के चंगुल से बचा जा सकें लेकिन......? हां लेकिन क्या हम सब चाहने के अलावा इसे हकीकत में बदलना चाहते हैं? क्या हम सब जवाबदेही तय करना चाहते हैं!
सारे सवालों का एक ही जवाब हैं - नहीं!
यह "नहीं" है जो हमें उत्कृष्ट बनने से रोक रहा है... और रोक रही है कुछेक लोगों की मानसिकता! जो चाहती ही नहीं है कि बदलाव हो!
यह सब आरोप मैं इसीलिए गड़ रहा हूं क्योंकि अभी कुछ दिन पहले की दो घटनाओं ने मुझे हैरान कर दिया।
मैं सोच में पड़ गया कि जिस बदलाव की ज्योत को हम जगाने की कोशिश कर रहे हैं, लोग उसी ज्योत रूपी मशाल को अपने ही पैरों तले कुचल रहे हैं।
उन लोगों के लिए मैं यही कहूंगा कि वह इस "अलख" को नहीं, अपने कर्मों और अपने बच्चों के सपनों को रौंद रहे हैं... वह मासूम से बच्चों के ऊंचे उड़ने वाले ख्वाबों को दफन कर रहे हैं; जो आखिर में दोनों के लिए घातक सिद्ध होगा।
घटना कुछ यूं सुनने में आई है कि माध्यमिक विद्यालय(असावरी) के कुछेक अध्यापकगणों द्वारा बच्चों के नियमित व समय अनुसार विद्यालय में आने-जाने को सुनिश्चित किया गया हैं; जिसका वह नियमित रूप से प्रबंधन कर रहे थे?
एक दिन विद्यालय गेट को विद्यालय समयानुसार बंद कर दिया गया था और एक लड़का लेट आया! वह गेट के बाहर खड़ा रहा हैं, जब अध्यापकों को पता लगा तो उन्होंने गेट के पास जाकर उससे अंदर आ जाने को कहा और कुछ समय के लिए दंडात्मक रूप के लिए मुर्गा बन जाने का आदेश दिया लेकिन उसने मुर्गा बनने से इंकार कर दिया और सुनने में आया कि वह घर भी चला गया! जो कि मेरी दृष्टि से कदापि सही नहीं है।
दूसरी घटना सुनने में कुछ इस प्रकार आई है कि विद्यालय के किसी अध्यापक द्वारा क्लासरूम में एक बच्चे के पास से मोबाइल पकड़ा गया और पकड़े गए मोबाइल को नियमानुसार विद्यालय प्रबंधन ने एक अनिश्चित समय के लिए जब्त कर लिया।
मोबाइल जब्ती के बाद उस लड़के की मां मारवाड़ी अनुसार "ओलबा" लेके विद्यालय आई और अपनी जिह्वा से तेज-तरार आवाज में धावा बोलने लगी; इसके साथ ही विभिन्न प्रकार के तर्क-वितर्कों से अपने बच्चे की पक्षकार हो गई।
पास ही स्थित पड़ोसियों को खरी-खोटी की आवाज़ें भी सुनाई देने लगी।
वाद-विवाद में विद्यालय के अध्यापकगणों द्वारा कहा गया कि स्कूल में मोबाइल फोन इस्तेमाल करना वर्जित है; तो उस महिला ने प्रतिउत्तर में कहा कि यह तो मोबाइल लेकर आएगा स्कूल में... यह हमारे घर में बड़ा लड़का है! इसके पापा बाहर रहते हैं! मैं फोन में जानती नहीं! फोन तो यह लेकर आएगा!
सच कहूं तो यह सब अपने एक दोस्त द्वारा सुनने के बाद तो मेरा "माथा" ही सनक गया। यह कौनसी बचाव करने की रणनीति हो चली हैं! कि घर का बड़ा लड़का है और माता-पिता अनपढ़ है तो वह विद्यालय के ऊपर ही सवा शेर बन जायेगा!
अरे वह कोई विद्यालय के नियमों से तो ऊपर है नहीं जो उसकी मर्जी चलेगी! घर थोड़े ही है यहां उसका।
गजब हो रहा है भई; पाकिस्तान के एक फैन की तरह यही कहूंगा कि - हैं भई मारो, मुझे मारो, नही मुझे मारो😁
पास के गांवों की विद्यालय में विकास की खबरें सुनते-पढ़ते हैं। अखबारों में विद्यालयों की न्यूजें भरी पड़ी होती हैं और अपने यहां...
हे राम, तेरी माया निरालीऔर असावरी पंजाब की "पराली"
...जिसे फसल रूपी स्वार्थ पकने के बाद जला दिया जाता है।
आखिर में एक विनती सभी ग्रामवासियों से कि "यह जो विद्यालय नियमों के खिलाफ हो रहा है यह अच्छा नहीं हैं" इसके दूरगामी परिणाम नकारात्मक प्रभाव ही डालेंगे।
विद्यालय विकास की यह गंगा एक दिन सबको व सबके सपनें को बहा ले जाएगी अगर ऐसा ही चलता रहा तो!
मैं तो मारे मन री बात कह दी... आप अपने विचार कमेंट बॉक्स में रख सकते हैं, पर आप सब नहीं रखेंगे क्योंकि आपके लिए इसका कोई महत्व नहीं है!
इसी के साथ; नमस्कार👏
©संजय ग्वाला


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