हर रोज यहां बलात्कार हो रहा है।
महिलाओं पर अब भी वही अत्याचार हो रहा है।।

दुश्मनों की गोलियों से हर दिन जवान शहीद हो रहा है।
कानून आज भी हलाल हो रहा है।।

फिर कैसे मैं कह दूं, मेरा देश आबाद हो रहा है!

गरीबों की साथ आज धोख़ा हो रहा है।
हर जगह अब मानवता के साथ मजाक हो रहा है।।

किसान सरकारों के आगे नतमस्तक हो रहा है।
इंसान भूख से मरने को बेबस हो रहा है।।

फिर कैसे मैं कह दूं, मेरा देश आबाद हो रहा है!

बच्चा छोटू बन कर बड़ा हो रहा है।
अमीरों के आगे हाथ फैलाये खड़ा हो रहा है।

बेटा पैदा कर नासमझ थाल पिटवा रहा है।
बहु के लिए गिड़गिड़ा कर ज़मीर जता रहा है।।

फिर कैसे मैं कह दूं, मेरा देश आबाद हो रहा है!

नेता वोट के लिए झाड़ू-पोछा लगा रहा है।
धर्म में बंट जाए इसलिए गोचा(आग) लगा रहा है।।

अधिकारों को खा कर अफसर पेट भर रहा है।
दमन करने को वो मसल बना रहा है।।

फिर कैसे मैं कह दूं, मेरा देश आबाद हो रहा है!

©संजय ग्वाला