सच कहूं तो जिंदगी से इतना परेशान हो चला हूं, कि मन करता है कहि खो जाऊं।
छोड़ के यह मतलबी दुनिया, ईश्वर के चरणों में समा जाऊं।।

यहां कोई मेरा साथ देने वाला नही है, सिवा तेरे।
उम्मीद है ख़ुदा तुझे तो तरस आएगा, तेरे इस नादां बंदे पर।।

हर पल तुझसे कहता रहता हूं, कि थक-सा गया हूं यहां तेरे बनाये माया के जंजाल में।
तू क्यों न मुझे मार के समाहित कर लेता, अपने सुदर्शन चक्र की धार में।।

मैं इतना घिस चुका हूं, कि तेरे चक्र की धार का काम करूंगा।
अगले वाले को मारू या ना मारू, पर लिख कर लेले स्वयं को जरूर मार डालूंगा।।

मैं यहां धरती पर तेरी बनाई, इस इंसानी बनावट से ऊब चुका हूं।
हर तरफ से घुट-घुट कर, कतरा-कतरा टूट चुका हूं।।

हर किसी की सुन लेता, तू बस एक अरदास में।
चीख़-चीख़ कर गला बैठ गया है, क्यों न मुझे मार डालता तू मौत के उस मैदान में।।

सुन ले रब, मेरी इक छोटी-सी विनती प्यार से।
मार कर मुझे समा ले अपने चरणों में ओर विदा कर दे इस धरती के जंजाल से।।

©संजय ग्वाला