वो आसमां में उड़ने के ख्वाब देखा करता था।
सफ़ेद कोट पहनकर, दो कदम चलना चाहता था।।
हर मोड़ पे उसके आगे कठिनाइयां थी।
वो उन्हें लांघकर बड़ा बनना चाहता था।।
तोड़ कर गांव की बंदिशें वो शहर चल पड़ा था।
ठोकरे खाकर शहर की, अब आहें भरने लगा था।।
वो आसमां में उड़ने के ख्वाब देखा करता था...
छुप छुप कर लाइटे चालू करके वो पढ़ने लगा था।
पकड़ा ना जाऊ इसलिए, वो एग्जाम से चंद पहले भी सोने लगा था।।
हर दर्द के आगे निडर रहने वाला, अब झुकने लगा था।
मजबूरी में राते काटकर, अब वो डरने लगा था।।
वो आसमां में उड़ने के ख्वाब देखा करता था...
एक मोड़ पर, वो कुछ गिड़गिड़ाने लगा था।
दो गज ऊपर उड़ा तो, फड़फड़ाने लगा था।।
सब कुछ जानकर भी, शायद खामोश रहने लगा था।
अंदर ही अंदर जलकर वो, ख़ाक होने लगा था।।
पुरानी बातों को याद कर, ठिठरने लगा था।
सब कुछ समझकर भी वो, संभलने लगा था।।
माँ के हाथ की अधपकी रोटी, भरपेट खाने वाला।
अब स्वयं आटा गूंथकर, मुलायम रोटियां खाकर भी भूखा रहने लगा था।।
एकांत में छत पर जाकर, घुट-घुट कर मरने लगा था।
चूल्हे के धुएं से भी खांसने वाला, अब अंदर से फटने लगा था।।
छोड़ के पराया शहर, गांव लौट आया था।
सपनों का गला घोंटकर, वो हंसकर आया था।।
हां वो आसमां में उड़ने के ख्वाब देखा करता था।
सफ़ेद कोट पहनकर, दो कदम चलना चाहता था।।
©संजय ग्वाला


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