मैं कुछ, परेशान-सा हूं।
आवाज बुलंद हैं, पर खामोश सा हूं।।


तन्हा अकेले, जी रहा हूं।
पर अजीब सी किसी, उलझन में हूं।


हां मैं कुछ, परेशान सा हूं...

घुट रहा है, कुछ अंदर ही अंदर।
शायद मैं, किसी ख्याल में हूं।।


बितयाना चाहता हूं, किसी के संग पल दो पल।
पर अजीब से, झंझालो में हूं।।


कोई मेरे घावों पर, मरहम जरा लगा दो।
बह रहा खून बेमतलब, शायद मैं मर रहा हूं।।


हां मैं कुछ, परेशान सा हूं...

दर्द कहता है, मैं तेरी रगों में उबाल मार रहा हूं।
तू बच नहीं सकता, तेरी ओर ही मैं दौड़ लगा हूं।।


कोई मेरे पास आकर, मुझे बहलाओ ना।
बह रही है नदियां नीर की, तुम सहलाओ ना।
तड़प रहा हूं, पास आकर मुस्कुराहओ ना।
चलकर मेरे संग, मुझे टहलाओ ना।
कैसे कटेंगे यह दिन-महीने, सोच रहा हूं।।


हां मैं कुछ, परेशान सा हूं...

©संजय ग्वाला