मैं बोल नही पाता हूं।
अपनी बात, ढंग से कह नही पाता हूं।
पता नहीं, मुझमें क्या खामी है।
सही, होकर भी अजीब-सी खामोशी हैं।
हूं अगर, मैं नाकाबिल,
तो सोच कैसे, ले पाता हूं।
क्या कमी है मुझमें,
जो मैं, बोल नही पाता हूं।
सुखों को देखता हूं।
दुखों को जीता हूं।
लब खोलने लगता हूं,
उससे पहले, हजार बार सोचता हूं।
ना जाने, कौनसा डर है, जिसे दबाता हूं।
क्यों मैं; चाहकर भी बोल नही पाता हूं।
मेरे सामने लोग, बातों से 'शेर' बना फिरते हैं।
गलत कहकर भी, अपना रूतबा ऊंचा जताते हैं।
एक मैं हूं, जो आवाज़ का 'घोल' बना पीता हूं।
कोई रौब जमाये मुझ पर, तो भी जीता हूं।
क्यों मैं; चाहकर भी बोल नही पाता हूं।
मैं चलते-चलते, गुनगुनाने लगता हूं।
पास कोई आ जाएं तो, खामोशी 'साध' लेता हूं।
कौनसा डर है, जो मुझमें रहता हैं।
क्या है ऐसा मुझमें,
जो हरदम, ना कहता हैं।
अपनी बात, ढंग से कह नही पाता हूं।
क्यों मैं; चाहकर भी बोल नही पाता हूं।।
©संजय ग्वाला


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