परसों मैं अपने गांव की सरकारी स्कूल में गया था, स्कूल द्वार पार करते ही वो बचपन ओर बचपना मन मस्तिष्क में फिर से जीवंत हो उठा... मन प्रफुल्लित सा हो गया उन यादों से!

आज भी जब कभी अपने स्कूल में जाता हूं तो हाथ जमीन की ओर से ललाट पर चले जाते हैं और एक विचित्र सी खुशी उत्पन्न हो जाती है जिसे शब्दों में बयां भी नहीं कर सकता।

बच्चे स्कूल में गिनती के ही नजर आ रहे थे शायद दोपहर की छुट्टी यानी इंग्लिश में बोले तो लंच ब्रेक हो रखा था इसलिए...

बरसों पहले की तरह अब भी कुछ अध्यापकगण अखबार पढ़ रहे थे तो कुछ #सेलो की कुर्सी पर बैठकर ध्यान-मग्न होकर सन-बाथ का आनंद ले रहे थे!

नजरें उधम मचाते के लड़कों-लड़कीयों की टोली पर जा पड़ी। सब अपने-अपने समूह बनाकर समय का सदुपयोग कर रहे थे... यही माहौल उस वक़्त हमें भी अच्छा लगता था, "कि मजे करो, सरकारी स्कूल हैं... गुरुजी और पिताजी तो वैसे भी हम पर ध्यान देंगे नहीं... इतने नंबर आने चाहिए! ऐसी-वैसी बातों का भी कोई दबाव आएगा नहीं" परंतु अब आज के मुकाम पर वो कसक महसूस होती है।

काश पढ़ लेते टेंस, रट लेते थीट्टा।
तो करवा देते, अब तक सबका मुंह मीठ्ठा।।

चलो छोड़ो! वक्त-वक्त की बात है... कल हमारा था, आज इनका हैं।

कुछ कदम आगे बढ़ा तो स्कूल के मुख्य बरामदे में पहुंच गया, जहां हर सुबह पहुंचने पर डर लगा रहता था कि "कही आज मेरा नाम ने पुकार ले #भीष्म_प्रतिज्ञा के लिए... डर इसलिए रहता था कि यह इनकी-उनकी मेरे से नहीं हो पाता था, किताब के चाहें कितने भी चैप्टर खड़े-खड़े पढ़वा लो! संस्कृत की एक श्लोक बोलनी होती थी प्रार्थना-प्रतिज्ञा के बाद... एक तो आज भी स्पष्ट तौर पर याद है, जो कुछ इस प्रकार है...

आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः |नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति ||

हिंदी अनुवाद नहीं करूंगा, आप खुद प्रयत्न करें।

काफी देर तक खड़ा रहा बरामदे में लेकिन अब वो माहौल और गर्माहट महसूस नहीं होती, जो पहले हुआ करती थी! जूतियों की चड़-चड़ाहट दूर से ही कानों तक आ जाया करती थी और अगर नजरे ऊपर कर ली तो रौद्र रूप लिए गुरुजी सफेद धोती-कुर्ते में गदाधारी भीम से कम नहीं लगते थे... मैडम साहिबा तो पहले की तरह आज भी सरस्वती रूप धारण किए हुए हैं, हालांकि अब वह मेरे किसी पन्ने पर संजय ग्वाला सीआईडी ऑफिसर, संजय ग्वाला यह! संजय ग्वाला वो! संजय ग्वाला फलाना-ढिमका नहीं लिखती हैं; कारण वही कि वक्त-वक्त की बात है।

बरामदे में कुछ आगे बढ़ा तो नजरें एक क्लासरूम को देखने के लिए दाई ओर मुड़ गई लेकिन नजरों के सामने जो नजारा दिखा वही आज का शीर्षक हैं- ईंट के सहारे नेताजी! आप सोच रहे होंगे कि शीर्षक मैंने गलती से लिख दिया, इसे आदर व सम्मान के सहारे नेताजी होना चाहिए था! तो आप गलत है! दीवार पर ना होकर नेताजी की एक तस्वीर अलमारी(दीवार वाली) में थी जिसके पीछे ना होकर आगे एक ईंट का टुकड़ा रखा था जो शायद नेता जी के आदर्शों, क्रांतिकारी सोच और राष्ट्रप्रेम को किसी मनोवैज्ञानिक तरीके से कुचलने व दबाने का प्रयत्न कर रहा था।

उस ईंट के सहारे वर्तमान में उनके मूल्यों का महत्व दिखाया जा रहा था और देखने वालों को आगाह भी किया जा रहा था कि वह 'बॉस' होकर भी मेरे नीचे दबा पड़ा है तो तुम्हारी क्या हैसियत!

दुख हुआ कि जिन क्रांतिकारियों ने देश को आजादी के साथ इस मुकाम पर पहुंचाया उन्हें आज तक उचित स्थान भी हासिल नहीं हो सका है! वह आज भी ईंट समान सरकारों व नौकरशाहों के नीचे दबे पड़े हैं और उनके मूल्यों व आदर्शों की होलियां जलाई जा रही है, सच में विचित्र है पर हकीकत है।

जय हिंद...
©संजय ग्वाला