जीवन के सुधि स्रोत से,
निकली सरिता कहती है।
हाहाकार मचा है मन में,
दो आंखें रोज बहती है।

क्यों ढल जाता है सूर्य,
बिना ऊर्जा तेज भरे।
क्यों मरता हमेशा मन,
बिन मुझसे बात करे।

क्यों अकेला हो जाता हूँ,
सबके पास रहकर भी।
क्यों रोने बैठ जाता हूँ,
सामने सबके हंसकर भी।

मुझे बेकार लगता है,
ये उत्सव भरा जीवन।
उजड़ा हुआ लगता है,
महकते फूलों का उपवन।

सब स्वप्न अंधेरे में ढह गये
आशा अब मेरी टूट गयी है।
उम्मीद उमंग थी तन मन में,
जाने कहाँ पीछे छूट गयी है।

लगता है जीवन अब शेष नहीं,
किनारा कर लेता हूँ मैं सब से।
ले जा मुझे तू यमदूत घर अपने,
राह देख रहा हूँ मैं तेरी कब से।