स्वराज लाना कितना मुश्किल है, ये मुझे तब पता चला।
जब मैं रास्तों की गोलाइयों में, धड़ाम से गिर पड़ा।।
इतनी जल्दी उठा और बाइक को खड़ा किया।
जितनी तेजी से अन्ना ने, संसद को हिला दिया।।
एक पैर में चप्पल थी, दूसरी को ढूंढने लगा।
पास आते लोगों को देखकर, अपने घावों को भूलने लगा।।
चलने लगा अपने घोड़े(बाइक) से, लगी एक भनक।
के जहां गिरा था, वहां भूल आया अपना ऐनक।।
गया मैं वापस वहां, जहां खून से सना पड़ा था।
उठाया अपना ऐनक और वापस दोड़ पडा़ था।।
मंजिल अभी दूर थी, रास्ता था लम्बा।
दर्द ऐसे हो रहा था, जैसे पड़ा हो सर-पे खम्बा।।
कठिनाइयों के हालात में, कभी ऊपर - कभी नीचे दोड़ने लगा।
डर के मारे शरीर भी, अपने घुटने मोड़ने लगा।।
पहुंचा घर तो माँ ने खुरदरे हाथों से सहलाया।
बताया माँ को, कि तेरा बेटा घर में "स्वराज" लाया।।
फिर मिलेंगे✍
©संजय ग्वाला


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