जीवन जिसे आप परिभाषित ही नही कर सकते क्योकी गरीब व्यक्ति इसकी परिभाषा कुछ निकालता है तो धऩवान व्यक्ति इसके बारे मे अपने अलग ही विचार रखता हे, तो वही मध्यमवर्गीय व्यक्ति इसे अपने अलग ही शब्दो से अंलकृत करता है।
अब किसके विचारो को सही मानकर जीवन को परिभाषित किया जाये।
अगर हम गरीब व्यक्ति से जीवन के बारे मे पुछे तो वो यही कहेगा कि बस रब से यही दुआ हे कि एक समय की रोटी देदे ओर इससे आगे कुछ नही चाहिये।
इसी सवाल के जवाब मे धऩवान व्यक्ति कहेगा कि बस साहेब Timepass हो रहा हे ओर अगर हमने व्यंग्य करते हुए उससे पुछ लिया कि भई Timepass कैसे हो रहा हे तो वो इसका रोचक व खिलखिलाते हुए जवाब देगा कि ओर क्या सुबह जल्दी उठना, नहाना, धोना, पीना, खाना ओर आँफिस रवाना हो जाना।
सारे दिन काम करना ओर सोचना कि अब बस जल्दी शाम हो जाये और घर को रवाना हो जाऊ फिर क्या जेसे ही शाम हुई ओर घर को रवाना लेकिन शाम भी खाना खाने ओर थोड़ी देर बाते बितयाते हुऐ कब रात मे बदल जाती है पता ही नही चलता।
इसके साथ ही रात भी यही सोचते-सोचते निकल जाती हे कि कल ये-ये काम करना हे आँफिस मे ओर इतने मे रात के 11-12 बज जाते है ओर उबासियाँ भी दस्तक देने लग जाती है आखिरकार थके-हारे सो जाते हे इस तरह अपना सुबह-शाम का जीवन यापन होता रहता है।
अब हम यही सवाल मध्यमवर्गीय व्यक्ति से करते हे तो वो परिपक्व-सा जवाब देता हे कि हमारा जीवन तो उड़ते कौवे की तरह है कि कब प्यास लग जाये ओर कब कंकड़ डालने पड़ जाये पता ही नही चलता।
अत: इन सबके विचारो से एक बात तो पक्की हो जाती की हम जीवन को परिभाषित ही नही कर सकते॥
फिर मिलेंगे✍
©संजय ग्वाला


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