तुम गये क्या, शहर सुना कर गए!
ठंडे पड़े इस दिल को गुनगुना कर गए
हम तो तुम्हें सितारें लाकर देने वाले थे
पर तुम तो खुद चांद हो चले थे।
सोचता हूं कभी, किसी पेड़ की छांव तले
क्यों तुम मुझसे रूठे, कैसे हो गये शिकवे-गिले
साथ रहकर, सात जन्मों की बातें किया करते थे
ख़फ़ा जो मैं हो जाता, तो छटपटाने लग जाते थे
तुम गये क्या, शहर सुना कर गए!
पुकारा जो हर बार हमनें, फिर भी अनसुना कर गए
क्या गलती हुई हमसे, जो बेवफ़ा बन गए
लबो पे पल-पल, तुम्हारा ही गान रहता था
रात को हर वक़्त, जिगर पर तेरा ही दारोमदार रहता था
तुम गये क्या, शहर सुना कर गए!
जब हमने तुम्हें प्यार से बहलाया था
तूमने भी आगे बढ़कर, दिल को हमारे सहलाया था
तुम बस, इससे आगे चलकर बेहक से गए
ठुकराके हमें भटक से गए।
तुम गये क्या, शहर सुना कर गए!
हम तुमसे ऐतबार पे एतबार करते रहे
पर तुम हमसे खिलौने की भांति खिलखिलाते रहे
फिर भी हम तुम्हें कभी फटकार ना सके
मोहब्बत की कश्ती को अंजाम तक लेजा ना सके
तुम गये क्या, शहर सुना कर गए!
तुम्हारी याद में हम, अब भी तड़पते रहते हैं
किस्मत की लकीरों को मसलते रहते हैं
जाने कोनसा हमने गुनाह किया
जो तुम हमें छोड़ कर, बेवफ़ा का खिताब लेते रहें
तुम गये क्या, शहर सुना कर गए!
©संजय ग्वाला


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