अरविंद का जनता दरबार




सुना था दिल्ली मे जनता का दरबार लगता है।
एक "फकीर" वहाँ बैठकर, सबकी फरीयाद सुनता है॥

सोचा एक दिन मैने की, मैँ भी उसके दरबार मे जाऊ।
उस "फकीर साहेब" से मिलके, अपनी समस्या सुनाऊ॥

गया मैँ भी हिम्मत करके, अरविन्द के दरबार मे।
पुछा मुझसे कारण ओर समस्या के बारे मे॥

बताई मैने अपने यहाँ आने की, हर बात उस आँफिसवाले को।
कहा उस नेक दिल इन्सान ने, की आना बुध, गुरू, शुक्रवार को॥

सोच कर उदास हुआ कि, गीता, अखलाक, गजेन्द्र के लिये time निकालते है।
ओर दुर से आये व्यक्ति को, यह 3-दिन मिलने बतलाते के है॥

जा रहा हुँ मैँ बिना मिले, उस जनता के फकीर से।
शायद मिलना उनसे हमारा, मिट गया हो इस "तकदीर" से॥

फिर मिलेंगे✍

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