याद आते हैं वो बचपन के दिन!


याद आते हैं वो बचपन के दिन
जब मासूम-सा चेहरा लेकर
आंखों में नीर लेकर
हाथों में बबुल की छड़ी लेकर
छोटा-सा टायर लेकर
सड़कों पर दौड़ा करते थे।

याद आते हैं वो बचपन के दिन
जब हौंसलों के संग आसमां छुआ करते थे
मामूली-सी बात पर नाराज हुआ करते थे
अंगुली पकड़कर स्कूल जाया करते थे
एक रुपये के लिए नागिन डांस किया करते थे।

याद आते हैं वो बचपन के दिन
जब दोस्तों के संग दौड़ लगाकर
5 रुपये की होड़ लगाकर
चड्डीयों पर कारी लगाकर
छुपके से रंग लगाकर
फिसलपट्टी से करतब लगाकर
उछलकूद किया करते थे।

याद आते हैं वो बचपन के दिन
जब पटाखों के शोर से
पिचकारियों के जोर से
अपनो के हिलोर से
मन उत्सुक रहा करता थे।

याद आते हैं वो बचपन के दिन
जब कंचो के निशाने में
डंडो से गिलियों को उड़ाने में
खुचियों की दड़ी में
चोर-पुलिस की लड़ाई में
लुक-मिचणी की दौड़ाई में
मार्ग सटा रहा करते थे।

याद आते हैं वो बचपन के दिन
दादा-दादी के दुलारे में
काका-पापा की कहानियों में
दूरदर्शन की सफ़ेदी में
राजा-रानी की लड़ाई में

याद आते हैं वो बचपन के दिन!

©संजय ग्वाला

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