ए-मौत मुझे गले लगा ले।



"दर्द जब हद से गुजर जाए'' तो क्या होता है, अरे भाई तब मौत आती है। इस मौत को कब से पुकार रहा हूं पर यह कमबख्त पता नही कहां चली गई है। अब बस "यम" से यही दुआ है कि वो मुझे मौत के आगोश में समा ले।😢

आगे की कहानी मेरी इस नई कविता से समझिए👇

थक गया हूं इस जिंदगी से, ए-मौत मुझे गले लगा ले।
तड़प-तड़प कर जीने से अच्छा है, तू मुझे अपनी बाहों में समा ले।।

तंगी इतनी रब तुझसे क्या छुपाऊं, कैसे तुझे मैं अपने दर्द की कहानी सुनाऊं।
खो रहा हूं गुमनामी के जंजाल में, अब कैसे तुझे में समझाऊं।।

थक गया हूं इस जिंदगी से, ए-मौत मुझे गले लगा ले।

ना अपने है ना पराये है, बस जिंदगी में दो राहे हैं।
एक सबक सिखा रही है, और दूसरी तड़पा रही है।।

थक गया हूं इस जिंदगी से, ए-मौत मुझे गले लगा ले।

ना कुछ बाकी है ना कोई साकी है, ए-जिंदगी अब तुम ही अल्लाह-राखी हैं।
दर्द इतना है दिल के मंज़र में, जैसे थार की तरह जिंदगी में आंधी है।।

थक गया हूं इस जिंदगी से, ए-मौत मुझे गले लगा ले।
तड़प-तड़प कर जीने से अच्छा है, तू मुझे अपनी बाहों में समा ले।।

©संजय ग्वाला

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