
यू ना भूल ग्रामीण मिट्टी को बंदे।
जिस पर तूने अपना सर्वज्ञ रूपी बचपन बिताया,
जिस मिट्टी पर तू रोना सीखा,
जिस मिट्टी पर तू हंसना सीखा,
जिस मिट्टी पर तू चलना सीखा,
जिस मिट्टी पर तू गिरना सीखा,
जिस मिट्टी ने तुझे पुनःउठाकर चलाना सीखा,
यू ना भूल इस ग्रामीण मिट्टी को बंदे।
है यह मिट्टी अन्नदाताओं की,
है यह मिट्टी वीर जवानों की,
यू ना भूल ग्रामीण मिट्टी को बंदे,
यू ना भूल ग्रामीण मिट्टी को बंदे।
तू शहर क्या चला गया उस चक्काचौंध जिंदगी में,
भूल गया इस ग्रामीण मिट्टी को बंदे,
जिस ग्रामीण मिट्टी की गलियों में तू घूमता था कागज की पंखी लेकर,
जिस मिट्टी की गलियों में तु मित्रों के साथ खेलता था कंचे,
उस मिट्टी को तु शहर क्या चला गया भूल गया बंदे,
यू ना भूल इस ग्रामीण मिट्टी को बंदे।
©सुरेंद्र शर्मा

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